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DNA ANALYSIS: पेड़ों के ​प्रति दोहरा मापदंड, पर्यावरण को बचाने को लेकर व्यवस्था में कितनी निष्ठा?

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नई दिल्ली: 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर आपने भी पर्यावरण को बचाने के लिए सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट लिखी होंगी या कोई फॉरवर्ड मैसेज शेयर किए होंगे. उस दिन इसे लेकर वेबिनार भी हुए. इन गोष्ठियों में पर्यावरण को बचाने की चर्चा हुई और 5 जून के बाद इस विषय को भुला दिया गया.

लेकिन हम इस विषय को नहीं भूले और इसीलिए आज हम DNA में आपके साथ एक ख़बर पर चर्चा करना चाहते हैं. ये ख़बर मध्य प्रदेश के छतरपुर से आई है, जहां 2 लाख 15 हज़ार 875 पेड़ों को काटने की तैयारी चल रही है.

पेड़ों के प्रति कितने सजग हैं हम

विश्व पर्यावरण दिवस पर पेड़ों के प्रति संकल्प दिखाने वाली व्यवस्था, बाकी दिन पेड़ों के प्रति कितनी सजग रहती है, ये ख़बर उसका नमूना है.

सबसे पहले हम आपको इस पूरी ख़बर के बारे में बताते हैं-

मध्य प्रदेश का छतरपुर ज़िला बुंदेलखंड क्षेत्र में आता है, जहां भूमिगत पानी का भयानक संकट है, लेकिन इस ज़िले में एक प्राकृतिक जंगल है, जिसे बकस्वाहा श्रेत्र कहा जाता है.

ये जंगल 364 एकड़ की ज़मीन में फैला है.

यहां कुल 2 लाख 15 हज़ार 875 पेड़ हैं.

और ये जंगल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 225 किलोमीटर दूर है.

पिछले कुछ वर्षों से इस जंगल में एक सर्वे चल रहा था, जिसमें ये बात चली कि इस जंगल में हीरे का सबसे बड़ा भंडार छिपा हुआ है.

अनुमान है कि जंगल की ज़मीन में 3 करोड़ 40 लाख कैरेट हीरे दबे हो सकते हैं.

इसके लिए एक कंपनी को नीलामी में जंगल की ज़मीन लीज़ पर दी जा चुकी है और इस जमीन पर हीरे की खदानों के लिए पेड़ों को काटा जाना है.

हीरे ज्यादा कीमती हैं या पेड़?

अब यहां सवाल ये है कि हीरे ज्यादा कीमती हैं या पेड़? इन पेड़ों को बचाने के लिए आसपास के लोगों ने संघर्ष शुरू कर दिया है. लोग चिपको आंदोलन की तर्ज पर यहां पेड़ों से चिपककर इन्हें बचाने का संकल्प ले रहे हैं और जंगल में पेड़ों पर रक्षा सूत्र भी बांधा गया है. इन लोगों का मानना है कि हीरों के लिए प्राकृतिक जंगल को नष्ट करना सही नहीं होगा और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इसे आप एक उदाहरण से समझिए-

एक रिपोर्ट के हिसाब से इस माइनिंग प्रोजेक्ट के लिए प्रति दिन 59 लाख क्यूबिक मीटर पानी की ज़रूरत होगी. इसके लिए पास में मौजूद बरसाती नाले की दिशा बदली जाएगी और इसका पानी इस्तेमाल होगा.

अब भारत सरकार की Central Ground Water Authority मानती है कि मध्य प्रदेश का छतरपुर ज़िला पानी के गंभीर संकट से जूझ रहा है. इसे देखते हुए इस जिले को सेमी क्रिटिकल की श्रेणी में रखा गया है. इस श्रेणी में वो जिले होते हैं, जहां पानी की समस्या अधिक होती है.

यानी पानी के संकट से जूझते छतरपुर में इस जंगल को खत्म करना सही नहीं है.

एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि इस जंगल में कई दुर्लभ पेड़ पाए जाते हैं. जैसे एक रिपोर्ट का अनुमान है कि यहां सागौन के 40 हज़ार पेड़ हैं.

इसके अलावा केम, पीपल, तेंदू, जामुन, बहेड़ा और अर्जुन जैसे औषधीय पेड़ भी यहां मौजूद हैं.

ऐसे में इन पेड़ों की कटाई से किसानों को भी नुक़सान होगा और आसपास रहने वाले लोगों की जीविका पर भी असर पड़ेगा. हालांकि कंपनियां इस जंगल को अलग नजरों से देख रही हैं.

इस खबर का व्यवसायिक पहलू ये है कि जैसे ही यहां हीरे की खदानें स्थापित होंगी, ये खदानें पूरे एशिया की सबसे बड़ी हीरे की खदान बन जाएगी.

अभी भारत में हीरे की खदानें आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हैं और बड़ी बात ये है कि अधिकतर हीरे की खदानें मध्य प्रदेश में हैं.

पर्यावरण को बचाने को लेकर व्यवस्था में कितनी निष्ठा

ये तो हमने आपको खबर बताई. अब हम आपको ये बताते हैं कि हमारे देश में पर्यावरण को बचाने को लेकर व्यवस्था में कितनी निष्ठा है?

इसी साल 29 अप्रैल को मध्य प्रदेश के रायसेन में एक किसान ने सागौन के दो पेड़ काट दिए थे, जब इस खबर की सूचना वन विभाग को मिली तो इस किसान पर कार्रवाई हुई और दो पेड़ काटने के लिए विभाग की तरफ से 1 करोड़ 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया. तब वन विभाग ने कहा था कि सागौन के एक पेड़ की उम्र 50 वर्ष होती है और इस उम्र में वो 60 लाख रुपये का फायदा करता है. अब सागौन के 40 हज़ार पेड़ तो इस जंगल में भी हैं तो क्या फिर इन पेड़ों को काटने के लिए विभाग प्रति पेड़ 60 लाख रुपये के हिसाब से 24 हज़ार करोड़ रुपये का जुर्माना भरेगा? ये एक बड़ा सवाल है.

वृक्षों के प्रति दोहरे मापदंड

हमारे देश में वृक्षों के प्रति इस तरह के कई दोहरे मापदंड आपको मिल जाएंगे. हालांकि ऐसा भी नहीं है, भारत में वन क्षेत्र सिकुड़ रहा है.

-भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में जंगल क्षेत्र बढ़ रहा है.

-इस समय देश में 24.56 प्रतिशत क्षेत्र में जंगल बसे हुए हैं. ये आंकड़ा 2019 का है. (india state of forest report)

-हालांकि सरकार ने लक्ष्य तय किया है कि ये कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत होना चाहिए. यानी ये अभी लक्ष्य से लगभग 8 प्रतिशत कम है.

सबसे ज्यादा वन क्षेत्र मध्य प्रदेश में

यही नहीं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पिछले वर्ष जानकारी दी थी कि वर्ष 2014 में देश में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद से 13 हज़ार 209 वर्ग किलोमीटर में जंगल का विस्तार हो गया है. इसी रिपोर्ट के हिसाब से इस समय सबसे ज्यादा वन क्षेत्र मध्य प्रदेश में है.

-भारत में लगभग साढ़े 6 लाख गांव हैं, जिनमें से लगभग 1 लाख 70 हज़ार गांव जंगल के किनारे पर बसे हुए हैं.

-यानी गांव के करोड़ों लोग अपनी जीविका के लिए इन जंगलों पर निर्भर करते हैं.

जैसे लकड़ी, ईंधन, चारा, औषधियां और फल. ये जंगल से ही मिलते हैं.

ये आंकड़े अच्छे संकेत देते हैं, लेकिन छतरपुर में जिन 2 लाख 15 हजार पेड़ों पर काटे जाने का खतरा मंडरा रहा है, वो खतरनाक है.

इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं. आज से 1500 वर्ष पहले लैटिन अमेरिका के पेरू देश में नाज़का सभ्यता अपने सैकड़ों वर्षों के इतिहास के बाद अचानक ग़ायब हो गई थी. ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के मुताबिक, इस सभ्यता ने अपने जंगल को काट कर कपास और मक्के की खेती शुरू कर दी थी, जिसकी वजह से वहां के रेगिस्तानी इलाकों का इको सिस्टम नष्ट हो गया. इसी कारण वहां बाढ़ आई और ये सभ्यता पूरी तरह नष्ट हो गई. सोचिए, जंगल को काटना इस सभ्यता को कितना महंगा पड़ा. लेकिन आज लोग इस बात को नहीं समझ रहे हैं, और वो वही गलती कर रहे हैं, जो इस नाज़का सभ्यता के दौरान हुई.

पेड़ों को बचाने का इतिहास

ऐसा नहीं है कि भारत में पेड़ों को बचाने के लिए संघर्ष नहीं हुआ. भारत में पेड़ों को बचाने का लम्बा इतिहास रहा है. हम आपको वन संरक्षण के लिए चलाए गए कुछ प्रमुख आंदोलनों के बारे में बताते हैं.

इनमें पहला है विश्नोई आंदोलन, 18वीं शाताब्दी में राजस्थान के मारवाड़ में महाराजा अभय सिंह ने अपने मेहरानगढ़ किले के लिए सैनिकों को पेड़ काट कर लाने के लिए कहा था, लेकिन इस बात की खबर जैसे ही इलाक़े के बिश्नोई समाज को लगी, उन्होंने विरोध शुरू कर दिया और तब ये लोग पेड़ों से चिपक कर खड़े हो गए थे. उस समय अमृता देवी इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही थी.

माना जाता है कि पेड़ों को बचाने के लिए महाराजा अभय सिंह की सेना के साथ संघर्ष में 350 से ज्यादा लोग मारे गए थे. महाराजा अभय सिंह को जब इस बात का पता चला तो उन्हें इस पर काफ़ी दुख हुआ और उन्होंने तब इसके लिए माफ़ी भी मांगी थी. यही नहीं तब उन्होंने ये आदेश जारी किया कि इस इलाक़े में ना तो पेड़ों को काटा जाएगा और न ही जानवरों को मारा जाएगा. ये क़ानून राजस्थान के बिश्नोई समाज के लोग आज भी मानते हैं.

पेड़ों के प्रति राजस्थान के बिश्नोई समाज का ये लगाव सदियों पुराना है. बिश्नोई समुदाय के गुरु महाराज जम्बाजी ने वर्ष 1485 में इस पंथ की स्थापना के समय पेड़ों और जानवरों की हत्या को अपराध माना था और ये समाज तभी से पेड़ों और जानवरों की रक्षा कर रहा है.

दूसरा उदाहरण है चिपको आन्दोलन- उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल और चमोली में वर्ष 1973 में ऐतिहासिक आंदोलन शुरू हुआ था. तब उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में नहीं आया था और ये क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा थे. इस आंदोलन की प्रमुख मांग थी कि जंगल के पेड़ों और संसाधनों का मुनाफा स्थानीय लोगों के हक में होना चाहिए.

इस आंदोलन में कई बड़े नेता शामिल रहे और सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी और सुदेशा देवी की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई. बहुगुणा पेड़ों और जंगलों को लेकर पर्यावरण से जुड़ी जागरूकता फैलाया करते थे. इस चिपको आंदोलन का नतीजा ये हुआ कि लोग पेड़ों को गले लगाने लगे थे और पेड़ों पर पवित्र धागे बांधने लगे थे, ताकि उन्हें कटने से बचाया जा सके. इस विशिष्टता ने इस आंदोलन को दुनिया भर में शोहरत दिलाई और फिर वर्ष 1978 में इन लोगों की मांगें मान ली गईं.

कहा जाता है कि ये आंदोलन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार के लिए भी सिरदर्द बन गया था.

तीसरा उदाहरण है, आपिको आंदोलन- वर्ष 1983 में उत्तर कर्नाटक के शिमोगा ज़िले में कुदरती जंगलों को बचाने के लिए ये जन आंदोलन शुरू हुआ था. इस आंदोलन की प्रेरणा चिपको आंदोलन था और पांडुरंग हेगड़े आपिको आंदोलन के चर्चित नाम थे. उस समय वन विभाग के ठेकेदार जब पेड़ काटने आते थे तो लोग पेड़ों से चिपक जाते थे और यह जागरूकता फैलाने के लिए जंगलों में पैदल मार्च, स्लाइड शो, लोकनृत्य, नुक्कड़ नाटकों जैसे कई तरीके अपनाए जाते थे. ये आन्दोलन लम्बा चला और आखिरकार आंदोलनकारियों की जीत हुई और सरकारी विभाग ने जंगल के हित को प्राथमिकता दी.

चौथा उदाहरण है जंगल बचाओ आंदोलन- वर्ष 1982 में बिहार के सिंहभूम ज़िले में आदिवासियों ने अपने जंगलों को बचाने का आंदोलन शुरू किया था. आज ये जगह झारखंड में है. ये आंदोलन इसलिए हुआ क्योंकि, कुदरती साल के पेड़ों के जंगल को सरकार ने कीमती सागौन के पेड़ों के जंगल के रूप में तब्दील करने की योजना बनाई थी. सरकार के इस कदम को तब राजनीति का लालची खेल करार दिया गया था और इसके बाद ये आंदोलन ओडिशा और झारखंड राज्यों में लंबे समय तक जारी रहा. इस आंदोलन के दौरान 18 लोग मारे गए और 15 हज़ार केस दर्ज किए गए. वर्ष 2006 में यूपीए सरकार ने जब जंगल अधिकार कानून पास किया, तब जाकर आदिवासियों के ऐसे आंदोलनों को राहत मिली.

और पांचवा उदाहरण है साइलेंट वैली बचाओ अभियान- ये बात है 1973 की, जब केरल के बिजली बोर्ड ने कुंतीपुझा नदी पर एक बड़े डैम की योजना बनाई थी, जिसकी वजह से लोगों में डर बैठ गया था कि तकरीबन साढ़े आठ वर्ग किलोमीटर के हरे भरे जंगल को इस डैम के नाम पर कुर्बान कर दिया जाएगा. कवयित्री और एक्टिविस्ट सुगाथा कुमारी और केरल शास्त्र साहित्य परिषद नामक संस्था ने इस जंगल को बचाने के लिए एक अभियान छेड़ा था, जिसमें कई संस्थाएं जुड़ीं. नतीजा ये हुआ कि वर्ष 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साइलेंट वैली को संरक्षित करने की घोषणा की और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट 1983 में वापस लिया गया.

1920 के दशक में भारतीय वैज्ञानिक डॉक्टर जगदीश चंद्र बोस ने पूरी दुनिया को पहली बार ये साबित करके दिखाया था कि पेड़ों को भी दर्द होता है और उनमें भी जीवन होता है. इसलिए ऐसा मत समझिए कि पेड़ कुछ समझते नहीं है. पिछले दिनों जब देश में ऑक्सीजन का संकट गहराया था, तब लोगों ने ऑक्सीजन का महत्व जाना, जो लोग भूल गए थे या ऑक्सीजन को मुफ्त का सामान समझते थे, उन्हें इसकी क़ीमत पता चली.

आज हम आपको पेड़ों से जुड़े कुछ ऐसे ही लाभ बताना चाहते हैं-

-पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं. इसलिए पेड़ों को हमारी इस पृथ्वी के Lungs भी कहा जाता है.

-एक पेड़ प्रतिदिन चार लोगों को मिलने वाली ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है.

-एक एकड़ ज़मीन पर लगे पेड़ 5 टन कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता रखते हैं

-पेड़ हमें गर्मी से भी बचाते हैं. एक पेड़ 1 से 3 डिग्री सेल्सियस तक तापमान कम रखता है

-पेड़ बाढ़ से भी बचाते हैं. ये बारिश का काफी पानी सोख लेते हैं, जिससे ये पानी नदियों में नहीं जाता

-पेड़ तूफानों को भी कमजोर करते हैं. पेड़ों की वजह से तूफानी हवाएं धीमी पड़ जाती हैं.

-पेड़ प्रॉपर्टी की वैल्यू भी बढ़ाते हैं. एक स्टडी के मुताबिक, जो घर हरे भरे पेड़ों के पास होते हैं, उनकी कीमत ज्यादा होती है.

-औषधीय पेड़ बीमारी के उपचार में वरदान साबित होते हैं. आयुर्वेद में पेड़ों को मेडिसिन माना गया है.

-हालांकि समय के साथ पेड़ों के योगदान को भुला दिया गया और आज की ये खबर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.





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