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DNA ANALYSIS: Corona Vaccine पर PM मोदी का अहम फैसला, समझिए क्यों जरूरी था ये निर्णय

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नई दिल्ली: आज DNA में हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐतिहासिक सम्बोधन का विश्लेषण करेंगे. कल 7 जून को प्रधानमंत्री ने कोरोना वैक्सीन को राजनीतिक विरोध से बचाने के लिए महत्वपूर्ण निर्णय किया.

पीएम मोदी के फैसले की अहम बातें

इस निर्णय के तहत अब भारत सरकार देश में 18 से 44 वर्ष के उम्र के लोगों को मुफ्त वैक्सीन लगाएगी और राज्य सरकारों को कंपनियों से वैक्सीन की खरीद नहीं करनी होगी. यानी प्रधानमंत्री का ये फैसला उस वैक्सीन की तरह है, जो इस विषय पर हो रहे राजनीतिक विरोध को खत्म कर देगी. इसलिए आज हम इस फैसले का विश्लेषण आपके लिए करेंगे.

सबसे पहले आपको इस फैसले की प्रमुख बातें बताते हैं-

-पहला फैसला ये है कि अब केन्द्र सरकार 18 से 44 वर्ष के उम्र के लोगों को भी मुफ्त वैक्सीन लगाएगी.

-अब तक केन्द्र सरकार 45 साल से ऊपर के लोगों को देशभर के सरकारी अस्पतालों में मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध करा रही थी.

-1 मई को लागू हुए फैसले में भारत सरकार ने तय किया था कि वैक्सीन के कुल उत्पादन को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा.

-कुल उत्पादन में से वैक्सीन की 50 प्रतिशत डोज केंद्र सरकार रखेगी और बाकी 50 प्रतिशत डोज राज्य सरकारों और प्राइवेट अस्पतालों को दी जाएंगी.

-अब होना ये था कि राज्य सरकारों को कं​पनियों से वैक्सीन की खरीद करनी थी और अपने राज्यों में 18 से 44 साल के लोगों को इसका टीका लगाना था.

-लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमारे देश में इस पर राजनीति शुरू हो गई और गैर बीजेपी राज्य सरकारों ने वैक्सीन को राजनीति का टूल बना लिया और देश में वैक्सीन को लेकर अव्यवस्था की तस्वीर पेश की गई.

-दिल्ली सरकार ने एक नहीं कई बार कहा कि कंपनियां सरकार को वैक्सीन नहीं दे रही हैं.

-यही नहीं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वैक्सीनेशन को राजनीतिक मुद्दा बना दिया.

-पंजाब ने भी यही किया. पंजाब में वैक्सीन खत्म होने की बात कही गई और दावा किया गया कि कंपनियां राज्य को वैक्सीन नहीं दे रही हैं.

-महाराष्ट्र ने तो ये आरोप लगाया कि कम्पनियों ने वैक्सीन देने के लिए लम्बा समय मांगा है.

-इस वजह से महाराष्ट्र में कुछ दिनों के लिए 18 से 44 साल के लोगों के लिए कई वैक्सीनेशन सेंटर्स को बंद भी किया गया.

-छत्तीसगढ़, झारखंड, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी यही हुआ, लेकिन अब इस राजनीति को ही केंद्र सरकार ने खत्म कर दिया है.

नए फैसले के तहत अब वैक्सीन के कुल उत्पादन में से 75 प्रतिशत हिस्सा केन्द्र सरकार को मिलेगा और 25 प्रतिशत डोज प्राइवेट अस्पतालों को उपलब्ध कराई जाएंगी. यानी बदलाव ये हुआ है कि जो 25 प्रतिशत डोज राज्य सरकारों के लिए रखी गई थी और जिनकी खरीद में कई राज्यों को मुश्किल हो रही थी, अब उसका काम भी केंद्र सरकार करेगी. सरल शब्दों में कहें तो राज्य सरकारों के नाकाम होने के बाद केन्द्र सरकार ने इस काम को अपने हाथ में लिया है.

यानी  केन्द्र सरकार अब 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को देशभर के सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में वैक्सीन लगाएगी. राज्य सरकारों को अब वैक्सीन कंपनियों से नहीं, बल्कि केन्द्र सरकार से मिलेंगी और यही वजह है कि हम सरकार के इस फैसले को राजनीतिक विरोध की वैक्सीन कह रहे हैं.

अब आपको दूसरे बड़े फ़ैसले के बारे में बताते हैं-

दूसरा बड़ा फैसला ये है कि अब प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीन की एक डोज के बदले मनमाने पैसे नहीं वसूले जाएंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि प्राइवेट अस्पताल वैक्सीन की एक डोज़ पर 150 रूपये से ज्यादा सर्विस चार्ज नहीं ले पाएंगे.

इस हिसाब से देखें तो प्राइवेट अस्पतालों में कोविशील्ड की एक डोज की अधिकतम कीमत 750 रुपये होगी क्योंकि, कंपनी से इसकी एक डोज प्राइवेट अस्पतालों को 600 रुपये में मिल रही है.

वैक्सीन की एक डोज के लिए वसूले जा रहे थे मनमाने पैसे

और कौवेक्सीन की एक डोज की अधिकतम कीमत 1350 रुपये होगी क्योंकि, प्राइवेट अस्पतालों को इसकी एक डोज कंपनी से 1200 रुपये में मिल रही है. ये फैसला बहुत जरूरी था क्योंकि, प्राइवेट अस्पतालों में लोगों से वैक्सीन की एक डोज के लिए मनमाने पैसे वसूले जा रहे थे. इस आप सोशल मीडिया पर हुए एक सर्वे के नतीजों से समझ सकते हैं.

ये सर्वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकल सर्किल्स ने किया है. जिसमें ये बात सामने आई कि भारत में 23 प्रतिशत लोगों ने कोविशील्ड वैक्सीन की एक डोज के लिए एक हजार रुपये से ज्यादा पैसे दिए और कोवैक्सीन के लिए 1500 रुपये से दो हजार रुपये तक दिए.

इसके अलावा 3 प्रतिशत लोगों ने वैक्सीन की एक डोज़ के लिए 2000 रुपये से भी ज्यादा की रकम खर्च की है. इससे ये बात तो स्पष्ट है कि कोरोना वायरस की वैक्सीन्स से प्राइवेट अस्पताल खूब मुनाफा कमा रहे हैं.

सरल शब्दों में कहें तो कोरोना की वैक्सीन, हमारे देश के बहुत से प्राइवेट अस्पतालों के लिए मुनाफा बनाने की वैक्सीन साबित हो रही थी। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि सरकार ने वैक्सीन की एक डोज पर 150 रुपये के सर्विस चार्ज को तय कर दिया है.

ये वो दो बड़ी बातें हैं, जिनका ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया.

ये फैसला जरूरी क्यों था?

अब आपको ये बताते हैं कि ये फैसला जरूरी क्यों था? असल में वैक्सीन पर विपक्षी पार्टियों का राजनीतिक विरोध उसी दिन से शुरू हो गया था, जिस दिन से कोरोना के टीकाकरण अभियान की शुरुआत हुई थी.

राज्य सरकारों और विपक्षी दलों ने जारी रखी राजनीति 

भारत में 16 जनवरी को दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू हुआ, लेकिन इसके शुरू होते ही कुछ नेताओं ने इस पर लोगों में भ्रम और डर फैलाना शुरू कर दिया. पहले इन नेताओं ने कहा कि भारत की मेड इन इंडिया वैक्सीन सुरक्षित नहीं है. कोवैक्सीन को मंज़ूरी मिलने के बाद कुछ राज्य सरकारों ने कहा कि वो इस वैक्सीन की खरीद नहीं करेंगी और अपने राज्यों में लोगों को ये वैक्सीन नहीं लगाएंगे. वैक्सीन के साथ दवाइयों की वितरण प्रणाली पर भी इन राज्य सरकारों और विपक्षी दलों ने राजनीति जारी रखी.

इसी राजनीति के बीच कुछ दलों ने ये मांग कर दी कि सरकार 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए वैक्सीन की विंडो खोल दे. इन पार्टियों ने ये सब तब किया, जब सरकार विज्ञान द्वारा स्थापित फॉर्मूले के तहत टीकाकरण अभियान चल रही थी.

विपक्षी पार्टियों ने फैलाया भ्रम 

ये फॉर्मूला कहता है कि पहले फ्रंटलाइन वर्कर्स को टीका लगे. फिर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को टीका लगे. फिर 45 वर्ष से ज़्यादा उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाई जाए और बाद में इसका प्रयोग 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए हो. लेकिन इन बातों को जानते हुए विपक्षी पार्टियों ने इस पर भ्रम फैलाया और लोगों के बीच ये तस्वीर पेश की कि सरकार के पास वैक्सीन नहीं है, इसलिए वो 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए ये विंडो नहीं खोल रही.

वैक्सीन पर यू-टर्न

हालांकि केन्द्र सरकार ने जब इस पर विचार करना शुरू किया तो इन पार्टियों और कुछ राज्य सरकारों ने ये मांग कर दी कि केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को भी वैक्सीन की खरीद करने दे और राज्य सरकारें 18 से 44 साल के लोगों के लिए वैक्सीनेशन ड्राइव चलाएं. केन्द्र सरकार ने जब इस फैसले को भी मान लिया तो ये पार्टियां और राज्य सरकारें ये कहने लगी कि देश में वैक्सीन को लेकर एक ही नीति होनी चाहिए. यानी यहां भी यू टर्न ले लिया.

उदाहरण के लिए राहुल गांधी ने 9 अप्रैल को प्रधानमंत्री को एक खत लिखा, जिसमें उन्होंने ये कहा कि केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को वैक्सीन की ख़रीद और उसके वितरण की छू दे. केन्द्र सरकार ने जब ये बात मान ली, तो 14 मई को उन्होंने एक ट्वीट करके ये कहा कि वैक्सीन की खरीद केन्द्र सरकार द्वारा ही होनी चाहिए. यानी एक महीने में ही राहुल गांधी अपनी बात से पलट गए.

इसी तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 24 फरवरी को प्रधानमंत्री को खत लिख कर कहा था कि केन्द्र राज्य सरकारों को वैक्सीन की ख़रीद करने की छूट दे, लेकिन जब भारत सरकार ने छूट दी तो उन्होंने भी अपनी मांग से यू टर्न ले लिया और मई के महीने में एक और चिट्ठी लिख कर ये कहा कि वैक्सीन को केन्द्र सरकार को ही देनी चाहिए और ये मुफ् होनी चाहिए.

ऐसे नेताओं में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस नेता आनंद शर्मा और केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी शामिल है. ये वो नेता है, जो पहले वैक्सीन पर कुछ कह रहे थे और बाद में इन नेताओं ने अपनी बात से यू टर्न ले लिया और वैक्सीन को अपनी राजनीति का एक टूल बना लिया.

आप चाहें तो इस टर्न को एक और उदाहरण से समझ सकते हैं. दरअसल, जब भारत वैक्सीन मैत्री के तहत दूसरे देशों को वैक्सीन भेज रहा था तब कांग्रेस इसके विरोध में थी, लेकिन जब केन्द्र सरकार ने इस पर रोक लगा दी तो कांग्रेस ने इसकी भी निंदा की और ये कहा कि सरकार के ऐसा करने से भारत की छवि खराब हुई है. सोचिए कांग्रेस ने कितना लम्बा यू टर्न मारा.

ओपन मार्केट में लाने की भी मांग 

कांग्रेस के कुछ नेताओं ने वैक्सीन को ओपन मार्केट में लाने की भी मांग की थी. लेकिन जब सरकार ने ऐसा किया तो उन्होंने इसकी निंदा की और ये कहा कि सरकार को सभी लोगों को मुफ़्त में वैक्सीन उपलब्ध करानी चाहिए. यानी जनवरी से हमारे देश में वैक्सीन पर राजनीति हो रही थी और इस राजनीति ने लोगों को गुमराह करने का भी काम किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज इस पर भी अपने विचार रखे.

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में वैक्सीन को लेकर अफ़वाह फैलाई जा रही हैं और लोगों को गुमराह किया जा रहा है. इसके अलावा उन्होंने उन्होंने वैक्सीनेशन के लिए चलाई जाने वाली इंद्रधनुष योजना की भी तारीफ की.

प्रधानमंत्री ने कहा कि 2014 में भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज सिर्फ 60 प्रतिशत के आसपास था. जिस रफ्तार से भारत का टीकाकरण अभियान चल रहा था, उस हिसाब से देश को शत-प्रतिशत टीकाकरण कवरेज का लक्ष्य हासिल करने में करीब 40 साल लग जाते, लेकिन सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए मिशन इंद्रधनुष योजना शुरू की और आज वैक्सीनेशन का कवरेज 90 प्रतिशत पहुंच गया है.

भारत में वैक्सीनेशन प्रोग्राम 1978 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा ‘प्रतिरक्षण के विस्तारित कार्यक्रम’ यानी EPI के रूप में शुरू हुआ था. इसके बाद वर्ष 1985 में, कार्यक्रम को ‘सार्वभौमिक प्रतिरक्षण कार्यक्रम’ के रूप में संशोधित किया गया और फिर 1989-90 तक देश के सभी जिलों को दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य कार्यक्रम के साथ कवर करने के लिए चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया.

हालांकि भारत में टीकाकरण अभियान की रफ़्तार काफी धीमी रही, लेकिन मिशन इंद्रधनुष के बाद इसकी स्पीड बढ़ाई गई और आज ये भारत के लिए रक्षा कवच का काम कर रहा है.





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